रांची: छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (सीएनटी एक्ट) की स्थापना को आज 117 वर्ष पूरे हो गए हैं। 11 नवंबर 1908 को लागू किया गया यह कानून झारखंड की जनजातीय भूमि और किसानों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए एक ऐतिहासिक कदम माना जाता है।
सीएनटी एक्ट का निर्माण बंगाल काश्तकारी अधिनियम 1885 की तर्ज पर किया गया था। हालांकि, इसमें अनुसूचित जनजातियों के लिए कुछ विशेष प्रावधान जोड़े गए, जिससे यह झारखंड की भूमि व्यवस्था के लिए अलग महत्व रखता है। इस अधिनियम में कुल 271 धाराएं शामिल हैं, जिनका उद्देश्य था — जनजातीय जमीनों की सुरक्षा और बाहरी हस्तांतरण पर रोक लगाना।
राज्य गठन के बाद डॉ. रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान (पूर्व में झारखंड जनजातीय कल्याण एवं शोध संस्थान) ने इस विषय पर 108 पन्नों की विस्तृत रिपोर्ट तैयार की थी। इसमें एक्ट का इतिहास, अध्ययन की विधि, क्षेत्रीय प्रभाव, और जनजातीय भूमि से जुड़ी समस्याओं का विश्लेषण शामिल था।
इतिहास बताता है कि जनजातीय विद्रोहों और सामाजिक संघर्षों के परिणामस्वरूप अंग्रेजों को यह कानून लागू करना पड़ा। इसका प्रारूप तैयार करने का श्रेय फादर जॉन हॉफमैन को दिया जाता है।
हालांकि, रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि एक्ट के शुरुआती वर्षों में भूमि विवादों को पूरी तरह सुलझाने में सफलता नहीं मिल सकी थी। बाद में 1938 और 1947 में इसमें महत्वपूर्ण संशोधन किए गए। अधिवक्ता रश्मि कात्यायन के अनुसार, अब तक करीब 57 बार प्रमुख संशोधन इस कानून में किए जा चुके हैं — जिनमें वर्ष 1929, 1938, 1948 और 1969 के बदलाव विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
आज भी सीएनटी एक्ट झारखंड के जनजातीय समाज की पहचान और भूमि अधिकारों का संविधानिक आधार बना हुआ है।

