रांची : झारखंड राज्य गठन के बाद बीते 25 वर्षों में नक्सलवाद पर लगातार कड़े अभियान, बेहतर रणनीति और समन्वित कार्रवाई के चलते ‘लाल आतंक’ अब लगभग सिमट चुका है। कभी 22 जिलों में फैला नक्सली प्रभाव अब सिमटकर पश्चिमी सिंहभूम के सिर्फ दो थाना क्षेत्रों तक रह गया है।
हालांकि इस लंबे संघर्ष में सुरक्षाबलों ने भारी कीमत भी चुकाई है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, नक्सलवाद का सफाया करते हुए अब तक 555 जवानों ने शहादत दी है, जिनमें 408 राज्य पुलिस और 147 केंद्रीय सुरक्षा बलों के जवान शामिल हैं।
नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या 16 से घटकर 4
झारखंड पुलिस की रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2005 में जहां 16 जिले विशेष रूप से नक्सल प्रभावित श्रेणी में थे, वहीं लगातार अभियानों के बाद सितंबर 2025 तक यह संख्या घटकर सिर्फ 4 जिले रह गई है। अधिकारियों का दावा है कि नक्सलवाद का खात्मा अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है।
लाल आतंक के खिलाफ जंग में 555 जवान शहीद
सुरक्षा बलों के लिए यह संघर्ष आसान नहीं रहा। अभियानों के दौरान कई बड़ी मुठभेड़ों, बारूदी विस्फोटों और हमलों में 555 जवानों ने जान कुर्बान की। इसके बावजूद सुरक्षा एजेंसियां अब भी आखिरी बचे उग्रवादियों के खिलाफ मुहिम तेज किए हुए हैं।
माओवादी, TPC, JJMP और PLFI जैसे गुटों का नेटवर्क ध्वस्त
राज्य में सक्रिय प्रमुख संगठन—
भाकपा माओवादी,
PLFI,
TPC,
JJMP,
जिनका कई दशकों तक प्रभाव रहा, अब लगभग समाप्त हो चुके हैं।
PLFI सुप्रीमो दिनेश गोप की गिरफ्तारी के बाद समूह पूरी तरह बिखर गया।
JJMP प्रमुख पप्पू लोहरा मुठभेड़ में ढेर हो चुका है।
कई उग्रवादियों ने आत्मसमर्पण किया है।
TPC सुप्रीमो ब्रजेश गंझू अब भी भूमिगत है, लेकिन संगठन का ढांचा लगभग खत्म माना जा रहा है।
अधिकारियों का कहना है कि बचे हुए सभी उग्रवादियों के खिलाफ अभियान जारी रहेगा, ताकि झारखंड को नक्सलवाद-मुक्त बनाया जा सके।

