धनबाद : हिंदी साहित्य के वरिष्ठ रचनाकार, आलोचक, अनुवादक और विचारक नारायण सिंह का 22 नवम्बर 2025 को पुणे में लंबे समय से चल रही बीमारी के कारण निधन हो गया। उनके निधन की खबर ने संपूर्ण कोयलांचल और साहित्य-जगत को गहरे शोक में डुबो दिया। धनबाद से चली साहित्यिक परंपरा का एक उज्ज्वल एवं प्रेरणादायी स्तंभ हमेशा के लिए खो गया।
नारायण सिंह, साहित्यकार परिषद धनबाद के संरक्षक और मार्गदर्शक थे। ‘पानी’, ‘माफ करो वसुदेव’, ‘ये धुआं कहां से उठता है’, और ‘सीता बनाम राम’ जैसी महत्वपूर्ण कृतियों के माध्यम से उन्होंने हिंदी साहित्य को नई दृष्टि प्रदान की। प्रतिष्ठित दैनिक में छपने वाला उनका लोकप्रिय साप्ताहिक कॉलम ‘एतवारू के बतकही’ पाठकों के बीच बेहद प्रिय रहा और उन्हें व्यापक पहचान दिलाई।
साहित्य के साथ-साथ खेल जगत में भी उनका योगदान महत्वपूर्ण रहा। वे झारखंड क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष पद पर सक्रिय रहे, जिससे कोयलांचल को गौरव प्राप्त हुआ। रघुवर नगर, कुंज विहार कॉलोनी, सुगियाडीह (धनबाद) में रहते हुए उन्होंने धनबाद को अपनी कर्मभूमि बनाया। वे भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (BCCL) के राजभाषा विभाग में मुख्य अनुवादक के पद से सेवानिवृत्त हुए।
रविवार को साहित्यकार परिषद, धनबाद द्वारा आयोजित श्रद्धांजलि सभा में उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की गई और दिवंगत आत्मा की शांति हेतु दो मिनट का मौन रखा गया।
सभा की अध्यक्षता परिषद के अध्यक्ष डॉ. अरविंद अंशुमान ने की।
परिषद के सचिव रंजन कुमार श्रीवास्तव ने उनके निधन को साहित्य जगत के लिए अपूर्णीय क्षति बताया।
मीडिया प्रभारी एवं वरिष्ठ पत्रकार आशीष कुमार अम्बष्ट ने कहा कि हिंदी के विकास में नारायण सिंह का योगदान अनुपम है। राजभाषा विभाग में उनकी कार्यशैली और मानक आज भी प्रेरणा देते हैं।
वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. अरविंद अंशुमान ने कहा कि नारायण सिंह का लेखन समाज के वंचित वर्गों और सामाजिक विकृतियों को आवाज देता था। उन्होंने आध्यात्मिक साहित्य को भी तार्किक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने की पहल की।
परिषद के कोषाध्यक्ष राजीव कंठ ने कहा कि उनका जाना साहित्य प्रेमियों के लिए एक बड़ी क्षति है।
इस मौके पर डॉ. सुनील सिन्हा, मनमोहन पाठक, अधिवक्ता जीतेन्द्र प्रसाद कर्ण, संजय सिंह चंदन, श्याम नारायण सिंह, डॉ. प्रेमचन्द्र लाल दास, सुनील श्रीवास्तव सहित कई साहित्यप्रेमियों ने अपनी शोक संवेदनाएँ प्रकट कीं।

