Hemant Soren Birthday: आज झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के नेता हेमंत सोरेन का जन्मदिन है। यह अवसर इसलिए खास है क्योंकि शायद यह पहला मौका है जब वे अपना जन्मदिन अपने जन्मस्थान नेमरा में मना रहे हैं। बचपन में उन्होंने कई बार अपने पिता और झामुमो के संस्थापक दिशोम गुरु शिबू सोरेन के साथ पैतृक आवास में जन्मदिन मनाया था, लेकिन पिता के निधन के बाद यह पहली बार है जब वे नेमरा में अपने परिवार के साथ जन्मदिन मना रहे हैं—बिना उस हाथ के, जो हमेशा उनके सिर पर आशीर्वाद के लिए रखा रहता था।
Highlights:
बारिश में खेतों में काम करते नजर आए
अपने जन्मदिन से कुछ घंटे पहले, हेमंत सोरेन गांव के खेतों में थे। मौसम में भारी बारिश हो रही थी, वे नंगे पांव थे और उन ग्रामीण महिलाओं की मदद कर रहे थे जो धान की बुवाई में जुटी थीं। यह दृश्य सिर्फ एक राजनीतिक तस्वीर नहीं था, बल्कि आदिवासी जीवन की उस परंपरा का प्रतीक था, जिसमें धान की फसल सदियों से आजीविका और संस्कृति का अहम हिस्सा रही है।
पिता के साथ आधी जिंदगी
हेमंत सोरेन ने अपनी जिंदगी का आधा हिस्सा अपने पिता के साथ बिताया। उनके हर बड़े या छोटे फैसले में पिता का मार्गदर्शन और सहमति होती थी। चाहे सत्ता में हों या विपक्ष में, हेमंत ने हमेशा अपने पिता के बताए रास्ते को अपनाया। जल, जंगल, जमीन के मुद्दों पर उनका रुख कभी नहीं बदला।
संघर्षों में पिता का सहारा
राजनीतिक जीवन में हेमंत को कई कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। ईडी की पूछताछ हो या जेल की सजा, हर मुश्किल में पिता शिबू सोरेन की हिम्मत और ताकत उनके साथ थी। यही कारण है कि हेमंत हमेशा आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ते रहे।
आज, जब शिबू सोरेन शारीरिक रूप से उनके साथ नहीं हैं, हेमंत नेमरा की मिट्टी में खड़े होकर उसी ताकत को महसूस करने की कोशिश कर रहे हैं। गांव के खेत, जंगल और पहाड़—सब उनके पिता की तरह उन्हें आशीर्वाद दे रहे हैं। ग्रामीणों को भी उम्मीद है कि “गुरुजी का बेटा” उनकी जमीन, जंगल और अधिकारों की रक्षा उसी तरह करेगा, जैसे उनके पिता ने की थी।
मार्गदर्शन की कमी, लेकिन संकल्प अटूट
जब तक शिबू सोरेन उनके साथ थे, तब तक राज्य चलाने में हेमंत को कभी गंभीर कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ा। जब भी चुनौतियां सामने आईं, पिता का अनुभव और सलाह उन्हें रास्ता दिखाते रहे। लेकिन अब हेमंत जानते हैं कि वह “जादू की झप्पी” उन्हें दोबारा नहीं मिलने वाली।
इसके बावजूद, उन्होंने ठान लिया है कि गुरुजी के आदर्शों और विचारों पर चलकर वे राज्य और अपने लोगों के लिए कठिन से कठिन लड़ाई भी लड़ेंगे। उनके लिए यह जन्मदिन सिर्फ उत्सव का दिन नहीं, बल्कि एक नया संकल्प लेने का अवसर है—अपने पिता के सपनों को पूरा करने का।
निष्कर्ष
हेमंत सोरेन का यह जन्मदिन नेमरा के लिए, झारखंड के लिए और उनके राजनीतिक सफर के लिए खास मायने रखता है। पिता के साए के बिना यह पहला जश्न है, लेकिन साथ ही यह उस परंपरा और संघर्ष की याद दिलाता है जिसने हेमंत को नेता बनाया। बारिश में भीगते खेत, धान की खुशबू, और ग्रामीणों का स्नेह—यह सब उन्हें उस विरासत की याद दिला रहा है जिसे उन्होंने संजोना है और आगे बढ़ाना है।
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