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Friday, December 5, 2025

बेवजह की मुकदमेबाजी पर झारखंड हाईकोर्ट सख्त, राज्य सरकार पर ₹50,000 का हर्जाना

 

रांची |

झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को बेवजह और बार-बार मुकदमेबाजी करने पर कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने कहा कि सरकारी धन जनता की संपत्ति है और इसे निरर्थक कानूनी लड़ाइयों में बर्बाद नहीं किया जाना चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने बुधवार को सुनवाई के दौरान कहा कि सरकार को “वेलफेयर स्टेट” के रूप में कार्य करना चाहिए, न कि एक ऐसे पक्षकार की तरह जो हर हाल में अपने नागरिकों के खिलाफ मुकदमा जीतना चाहता है।

अदालत ने इस मामले में सरकार की अपील याचिका को खारिज करते हुए ₹50,000 का हर्जाना लगाया और टिप्पणी की कि यह राशि पहले संबंधित कर्मचारी को दी जाए तथा छह महीने के भीतर जिम्मेदार अधिकारी से वसूली की जाए।

⚖️ क्या है पूरा मामला

मामला अखिलेश प्रसाद नामक अधिकारी से जुड़ा है, जो पहले बिहार सरकार में सहकारिता विस्तार पदाधिकारी थे। झारखंड गठन के बाद वे राज्य प्रशासनिक सेवा में शामिल हुए।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद सरकार ने उनकी पदस्थापना 2013 से प्रभावी करने में देरी की। इस पर अखिलेश प्रसाद ने झारखंड हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

एकल पीठ ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया, लेकिन राज्य सरकार ने फिर से अपील दायर कर दी — जिसे खंडपीठ ने “बेमानी और बेवजह की मुकदमेबाजी” बताते हुए खारिज कर दिया।

अदालत की सख्त टिप्पणी

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि

“राज्य के अधिकारी यह भूल जाते हैं कि मुकदमेबाजी का खर्च सरकारी खजाने से होता है, उनकी जेब से नहीं। इसलिए वे बिना सोचे-समझे अपीलें दाखिल करते हैं।”

कोर्ट ने झारखंड सरकार को निर्देश दिया कि 2011 में जारी अपनी मुकदमेबाजी नीति (Litigation Policy) को सख्ती से लागू करे और ऐसे मामलों की नियमित समीक्षा की जाए, ताकि जनता का पैसा व्यर्थ न जाए।

‍⚖️ महत्वपूर्ण बिंदु

हाईकोर्ट ने सरकार की अपील को खारिज किया।

₹50,000 का हर्जाना लगाया गया।

राशि संबंधित कर्मचारी को भुगतान कर, अधिकारी से वसूली का आदेश।

सरकार से “मुकदमेबाजी नीति” का कड़ाई से पालन करने को कहा गया।

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